अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन में प्रभुत्व की अवधारणा कितनी सटीक है?

US Hegemony in International Relations

कुछ महीने पूर्व मेरे एक सम्बन्धी ने “प्रभुत्व” शब्द का इस्तेमाल किया था पारिवारिक सम्बन्धों और उन्नति के सन्दर्भ में। उन्होंने इसका उल्लेख उनके दिवंगत पिता और मेरे बुजुर्ग़ पिता के व्यक्तित्व के लिए किया था। सज्जन का नाम है अभिषेक। इस पोस्ट में हम छलाँग लेंगे सामाजिक सम्बन्धों में वर्चस्व से hegemony in international relations पर। यानि इस पोस्ट में हम देखेंगे कि प्रभुत्व की अवधारणा अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन में कितनी सटीक है। स्पष्ट है, hegemony के लिए मैं इस पोस्ट में प्रभुत्व शब्द इस्तेमाल कर रहा हूँ। उक्त मित्र को धन्यवाद।

Hegemony equates to US hegemony

प्रभुता की संकल्पना महज़ पुस्तकों तक सीमित नहीं है। आम लोग भी इस धारणा से बखूबी परिचित हैं। बस, उनके शब्द उतने परिष्कृत नहीं होते और उनकी तर्क-प्रस्तुति उतनी व्यवस्थित नहीं होती। “अमरीका की दादागिरी” किसने नहीं सुना है?

इसमें दो राय नहीं कि प्रभुत्व के सैद्धान्तिक महत्व पर बहस की शुरुआत की थी Antonio Gramsci एवं उनकी पुस्तक Prison Notebooks ने। फ़िलवक्त में इस संकल्पना ने कई विषयों में पैठ बना ली है मसलन मानव या नृविज्ञान, सामाजिक भाषा-विज्ञान, साहित्य-संस्कृति अध्ययन तथा नव-औपनिवेशिक अध्ययन।

इसमें भी दो राय नहीं कि शीत-युद्ध के पश्चात प्रभुत्व का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में अमरीकी प्रभुत्व। सनद रहे कि यह प्रभुत्व सिर्फ़ राजनितिक-सैनिक नहीं है वरण विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यमिता, खेल तथा लोकप्रिय-सँस्कृति के स्तर पर भी है।

पश्चिमी राजनितिक-आर्थिक वैचारिक वर्चस्व इससे सिद्ध होता है कि चीन तक इसे अनुकरण करने की कोशिश करता है – आंशिक ही सही। पूर्वी यूरोप में भी तो अमेरिका वैचारिक लड़ाई जीत चुका ही है। That is, US hegemony in international relations is established. संक्षेप में, प्रभुत्व माने अमरीकी प्रभुत्व।

Gramscianism & Neo-Gramscianism

एंटोनिओ ग्राम्स्की के अनुसार अन्य समूहों के रोज़मर्रा के जीवन के कार्यों के हितों, वरीयताओं और नियंत्रण के मामले में शासक वर्ग को प्राप्त वर्चस्व ही प्रभुत्व है यदि यह वर्चस्व सबकी सहमति से शासक वर्ग को प्राप्त होता है। यदि शासक वर्ग यह सर्वसम्मति खो देता है तो राज्य संकट में है क्योंकि शासक वर्ग अब नेतृत्व नहीं कर रहा बल्कि मात्र अन्य वर्गों पर सैन्य-बल की वज़ह से हावी है। आधिपत्य पर संकट तब आता है जब सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व बिलकुल अलग-अलग हो जाएँ। ऐसी स्थिति में यदि कोई नया शासक वर्ग अन्य वर्गों के साथ सहमति पर पहुँचता है तो यह एक नए आधिपत्य-ब्लॉक के निर्माण को चिन्हित करेगा।

स्पष्ट है कि जहाँ यथार्थवाद सिर्फ़ शक्ति की बात करता है, ग्राम्स्की के सिद्धान्त में शक्ति एवं सहमति दोनों समाहित है। ग्राम्स्की के विचारों में शासकीय वर्चस्व या प्रभुत्व एक रणनीतिक लक्ष्य है जिसे पाने के लिए अंतर्वर्गीय गठबन्धन किए जाते हैं और इस तरह एक सामाजिक वर्ग के राजनैतिक-वैचारिक नेतृत्व के तहत एकात्मक राजनीतिक ब्लॉक का निर्माण किया जा सकता है।

सनद रहे कि ग्राम्स्की ने अपने विचार किसी राज्य के अन्दर के वर्गों के आपसी सम्बन्धों-समीकरणों को ले कर व्यक्त किया था। नव-ग्राम्स्कीवाद ने इसे अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के संदर्भ में पारिभाषित किया। इस सन्दर्भ में रॉबर्ट कॉक्स का नाम महत्वपूर्ण है। कॉक्स ने अपना ध्यान मुख्यतः वैश्विक पूंजीवाद से उत्पन्न भौतिक असामानताओं पर लगाया है। वैश्विक स्तरीय आधिपत्य मूलतः किसी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित आधिपत्य का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तारण होता है। Hegemony in international relations is based forced consent and compliance. अर्थात सारांशतः, नव-ग्रामियन स्कूल का मानना है कि प्रभुत्व शक्ति आधारित आधिपत्य के बजाए राजनीतिक और वैचारिक नेतृत्व पर बनी सहमति का परिणाम होता है। 

International Political Economy and Hegemonic Stability Theory

इस थ्योरी का सबसे पहले इस्तेमाल किया था अमरीकी विशेषज्ञ Keohane ने 1980 में। बाद में कई लोगों ने इसमें अपना योगदान किया और इसे उन्नत किया। यहाँ मुख्य तर्क यह है कि राष्ट्र-राज्यों के राजनीतिक निर्णय अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मौद्रिक प्रवाह को तथा इस प्रक्रिया में उद्यमिओं के आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं। Kenneth N Waltz की पुस्तक Man, the State and War इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। 1970 के दशक की घटनाओं यथा OPEC के अभ्युदय तथा 1973-74 के अरब तेल प्रतिबन्धों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अध्ययन की ओर विशेषज्ञों का ध्यान आकृष्ट किया।

इनका मुख्य तर्क यह है कि अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में आर्थिक सहयोग और निरन्तरता के लिए एक शक्तिशाली आधिपत्यवादी राष्ट्र या राष्ट्र-समूह का होना आवश्यक है अन्यथा अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली की अराजकता आर्थिक सहयोग को असम्भव कर देगी। HST सिद्धान्त का कहना है कि एक प्रभुत्ववादी व्यवस्था के क्षरण के पश्चात दूसरी प्रभुत्ववादी व्यवस्था का उदय आवश्यक है वरना राजनैतिक-आर्थिक अराजकता छा जायेगी। In short, hegemony in international relations is vital to enforce systemic stability in the wake of nation-states’ anarchic behaviour. विश्व-युद्ध पश्चात ब्रिटेन का पराभव, Bretton Woods प्रणाली का बिखरना तथा सोवियत संघ का टूटना अलग-अलग प्रभुत्ववादी व्यवस्थाओं के क्षरण के उदाहरण हैं। HST के अधिकांश विद्वान विगत दो शताब्दियों में दो देशों के आधिपत्य पर सहमत हैं – एक, 1815 से 1939 तक ब्रिटेन और दो, 1945 से लेकर अब तक अमेरिका।

How do different theories of hegemony compare?

अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में प्रभुत्व तथा प्रभुता के स्थायित्व की संकल्पनाओं का अध्ययन करने हेतू हम तीन विचारधाराओं की तुलना कर सकते हैं यथापि नव-यथार्थवाद (Neo-realism), नव-उदारवाद (Neo-liberalism) एवं Neo-Gramscianism.

प्रथमतः, इनमें भिन्नता विषय-प्रमुख को लेकर है। विषय-प्रमुख दो हैं – actors एवं conditions. उदाहरण के लिए नव-यथार्थवादी तथा नव-उदारवादी सिद्धांतों में राज्य (State) प्रमुख़ है जबकि Neo-Gramscianism में सिविल सोसाइटी का भी महत्वपूर्ण स्थान है। हक़ीक़त में Neo-Gramscianism विचारधारा में राज्य और सिविल सोसाइटी अभिन्न नहीं हैं। जब हम स्थितिओं की बात करते हैं, नव-यथार्थवाद कठोर शक्ति पर आधारित है तो नव-उदारवाद नम्र शक्ति पर। Neo-Gramscians राज्य की ताक़त के साथ-साथ सामाजिक शक्ति पर विमर्श करते हैं।

Hegemony in international relations के अलग-अलग सिद्धान्त अलग-अलग व्याख्याएँ देते हैं क्योंकि उनके सन्दर्भ भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए नव-यथार्थवाद सुरक्षा पर बल देता है तो नव-उदारवाद आर्थिक वर्चस्व पर। नव-उदारवादी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को महत्वपूर्ण समझते हैं तो नव-यथार्थवादिओं के लिए राज्य ही सर्व-महत्ता का केंद्र है। इन सबसे भिन्न ग्राम्स्कीवादी संस्कृति तथा सहमति पर जोर देते दिखते हैं। दरअसल साँस्कृतिक प्रभुता का सिद्धान्त Antonio Gramsci के साथ ही जुड़ा हुआ है।

अमरीका – चीन व्यापार युद्ध

अमरीका और चीन के बीच व्यापार युद्ध को Theory of Hegemonic Stability की नज़र से देखा जा सकता है। एक स्थापित सत्ताधीश सिर्फ एक दूसरे उभरते सत्ता-केंद्र के ख़िलाफ़ खड़ा नहीं दिखता वरण वह भूमंडलीकरण से त्रस्त दिखता है। इस ‘अमेरिका फर्स्ट ‘ की राह में जो भी राष्ट्र होगा उसके ख़िलाफ़ अमरीका होगा।

और हाँ, इसे सिर्फ़ ट्रम्प के व्यक्तित्व से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। नेतृत्व समय के अनुकूल होता है और नीतियाँ शून्य में जन्म नहीं लेतीं। जो भी हो, हमें नहीं भूलना चाहिए राजनीतिज्ञ जैसे भी हों, ट्विटर पर स्पेलिंग आदि की ग़लतियाँ जितने भी करते हों, ट्रंप एक सफ़ल बिज़नेसमैन तो ज़रुर हैं। बस अभी वे अपने देश का बिज़नेस संभाल रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय समाज मूलतः अराजक है। हंस मोर्गेंथाऊ के यथार्थवादी संकल्पना को याद करें तो राष्ट्रीय हित के नाम पर राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाना ही यहाँ एकमात्र लक्ष्य है। न्याय और नैतिकता यहाँ बेमानी हैं। अमरीका – चीन व्यापार युद्ध इसी का अंग है। व्यापक नजरिये से देखें तो यह नयी ईश्वी में प्रभुत्व की लम्बी खींचने वाली लड़ाई है।

How does hegemony serve the international system?

अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली का स्थायित्व निर्भर करता है किसी एक देश या देशों के एक समूह के प्रभुत्व पर। यह प्रभुत्व काम कैसे करता है ? दरअसल अर्थ जगत में हमेशा दो तरह के गुड्स की जरुरत होती है – प्राइवेट गुड्स तथा पब्लिक गुड्स की। हम घर बना सकते हैं सड़क नहीं। हम कार ख़रीद सकते हैं उसे चोरी से नहीं बचा सकते। हम आतंकिओं से खुद को नहीं बचा सकते।

तथापि ये जो पब्लिक गुड्स हैं उनकी हम हमेशा कीमत भी अदा नहीं करते। हम सब तो टैक्स नहीं भरते। लेकिन ख़्याल रहे, सरकारी प्रभुत्व हम से टैक्स ले ही लेती है। ग़रीब इनकम टैक्स नहीं भरते तो क्या हुआ, अप्रत्यक्ष कर तो भीखमंगों से भी सरकारें वसूल लेती हैं।

सिर्फ एक प्रभुत्व – पूर्ण सत्ता के पास ही वह प्रेरक कारक और सामर्थ्य हो सकता है कि वह अंतराष्ट्रीय सुरक्षा, मुक्त व्यापार, विदेशी निवेश, अंतराष्ट्रीय मुद्रा, इत्यादि जैसे पब्लिक गुड्स की उपलब्धता सुनिश्चित कर सके और साथ ही दुष्ट या मुफ़्त की सवारी करने वाले राष्ट्रों पर लग़ाम लगा सके और उन्हें भी कीमत अदा करने को बाध्य कर सके।19 वीं शताब्दी की गोल्ड स्टैन्डर्ड प्रणाली और द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात ब्रेटन वुड्स प्रणाली एक देशीय प्रभुत्व के कारण ही संभव हो सके थे।

अंततः, बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ने दो विश्व युद्ध दिए थे। उस व्यवस्था को स्थिर तो नहीं कहा जा सकता। द्विध्रुवी युग में स्थिरता थी। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रतिस्पर्धा से तनाव और चिन्ता तो थी; हालांकि यह अपेक्षाकृत निस्संदेह स्थिर था। कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा-जनित प्रगति भी दर्ज़ की गई। एकध्रुवीयता से विश्व-व्यवस्था में भारी बदलाव आया है। Established hegemony in international relations, however, doesn’t guarantee world peace. युद्धों में कमी आई है परन्तु आतंकवादी हमलों में वृद्धि हुई है। 

Was The Great Depression caused by the Absence of Hegemony?

बड़े राष्ट्र यदि प्रभुता का प्रदर्शन करते हैं तो अन्याय की आशंका होती है परन्तु वे यदि अन्तर्राष्ट्रीय समाज से कट कर “शानदार अकेलेपन” को अपनाएं तो प्रणाली के ध्वस्त होने का ख़तरा सामने आ खड़ा होता है। ऐसा करना शक्ति की अवधारणा को निस्तेज करना है जिस पर सम्पूर्ण सामजिक ढाँचा टिका हुआ है।

अन्तर्राष्ट्रीय इतिहास के जानकार यह मानते हैं कि एक देशीय प्रभुत्व और आर्थिक स्थाईत्व के मध्य एक धनात्मक सम्बन्ध है। 1850 से 1914 के स्थाईत्व को हम ब्रिटिश नेवी के प्रभुत्व से जोड़ कर देख सकते हैं। विज्ञान में भी तो उसी का बोलबाला था।

विद्वान Great Depression को वास्तविक प्रभुत्व के न होने का ही परिणाम और मिस-मैनेजमेंट मानते हैं। तर्क यह है कि प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात ब्रिटेन आर्थिक रूप से पर्याप्त शक्तिशाली नहीं रह गया था। अंतरराष्ट्रीय मुक्त व्यापार व्यवस्था को समर्थन देने के विपरीत वह खुद ही अपने साम्राज्य में ब्लॉक के निर्माण में लग गया था। दूसरी तरफ़ अमेरिका उस वक़्त splendid isolation में जी रहा था। इस तरह वास्तविक आधिपत्य का अभाव था। सच तो यह है कि 1929 की महामंदी इस वज़ह से ही हुई कि प्रभुता की ज़वाबदेही लेने को कोई राष्ट्र उपलब्ध या तैयार नहीं था। If not caused, the Great Depression was at least precipitated unchecked owing to absence of hegemony in international relations. ब्रिटेन की सत्ता ढह चुकी थी और अमरीका कूप्मण्डुक रहने को उतावाला था।

How did the US ascend to hegemony and respond to challenges?

ब्रिटेन के पराभव और दो विश्व-युद्धों के पश्चात शीत-युद्ध का काल द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था या शक्ति-सन्तुलन का काल था। इस दरम्यान अमेरिका ने अपने सैनिक ताकत में सर्वाधिक इजाफ़ा किया; साथ ही युद्ध से तबाह यूरोपीय देशों की मार्शल प्लान के तहत मदद कर अपनी स्थिति सुदृढ़ की। प्रजातंत्र के नाम पर नैतिक नेतृत्व भी करता रहा है। स्पष्टतः उसका प्रभुत्व बहुआयामी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व-बैंक ने वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था सुनिश्चित की। सोवियत संघ का विघटन मुख्यतः उसकी आर्थिक स्टेग्नेशन के कारण हुआ। परिणामतः, एकध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का जन्म हुआ जिसे अब तक सफ़ल चुनौती नहीं मिल पाई है।

चूँकि राष्ट्र-राज्य तर्क-संगत कार्य करते हैं, उनकी रणनीति का निर्णय लागत-लाभ मूल्यांकन पर निर्भर करता है। और चूँकि अमरीका ने अपने सहयोगिओं को यथास्थिति बरक़रार रखने के लिए हर प्रोत्साहन प्रदान किया है अतः शक्ति-सन्तुलन की कोशिश समर्थ राष्ट्रों द्वारा नहीं हुई है। मसलन, संघर्ष-संभावित क्षेत्रों में सेना उपलब्ध करा कर अमरीका ने आवश्यक सुरक्षा की पेशकश की है ताकि समर्थ राष्ट्र हथियारों की होड़ में शामिल न हों। हाँ, US प्रभुत्व को भी चुनौती मिली है – उदाहरणतः, नव अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order) की मांग के रूप में। उसने इसका सामना किया आर्थिक सहायता और तख़्तापलट की कोशिशों को समर्थन दे कर।

पश्चिमी प्रभुत्व के निभ्न कारक रहे हैं, यथा पूँजी पर नियंत्रण, उत्पादकता, कच्चे माल पर नियन्त्रण, स्थिर मौद्रिक प्रणाली, IMF, WTO, विश्व-बैंक जैसी संस्थाएँ, उच्च शिक्षण संस्थान तथा अंतरराष्ट्रीय तेल पर प्रभुत्व। यह प्रभुत्व आता है समावेशी आर्थिक सम्पन्नता, वैध राजनितिक प्रणाली, वैज्ञानिक वैभव, अपराजेय सैन्य क्षमता, अकूत प्राकृतिक संसाधन, तथा दृढ राजनितिक नेतृत्व की बदौलत। 18 वीं और 19 वीं शताब्दी में ब्रिटेन इस स्थिति में था एवं 20 वीं शताब्दी में अमरीका इस स्थिति में रहा है। अब, 21 वीं शताब्दी में समीकरण बदल रहे हैं।

Future of US hegemony

विडंबना ये है कि स्थायित्व प्रदान करने वाला प्रभुत्व खुद ही स्थायी नहीं होता। पिता बूढ़ा हो ही जाता है! बात सिर्फ़ समय की नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दरअसल प्रभुत्व क़ायम रखने की क़ीमत चुकानी होती है। राजा मुफ़्त नहीं बना जाता।

लंबे अन्तराल के बाद ऐसा वक़्त आता है जब प्रभुत्व की क़ीमत प्रभुत्व के लाभ से बहुत ज़्यादा होने लगे। इस दरम्यान अर्थ एवं राजनीतिक ताक़त का पुनर्विभाजन भी तो सतत होता रहता है। विज्ञान और खेल भी अपने खेल खेलते रहते हैं।

हालाँकि, विश्व-व्यवस्था में बदलाव अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में बुनियादी सरंचनात्मक बदलाव की गारंटी नहीं है। अराजकता, लालच, संदेह, भय और अस्तित्व के लिए संघर्ष अभी भी इसका चरित्र है और हमेशा रहेगा। यही मानव-प्रवृत्ति है तो मानवों से निर्मित राष्ट्र-राज्यों और राज्य-समूहों की प्रवृति भिन्न कैसे हो सकती है?

पूर्ण वैश्विक-प्रभुत्व राष्ट्र-राज्यों की अन्तिम अभिलाषा है परन्तु यह स्थायी नहीं है। चुनौतियाँ मिलती रहती हैं। भारी लागत चुकानी पड़ती है। वैश्विक आधिपत्य भूमण्डलीय कारणों से भी असंभव-सा है। क्षेत्रीय प्रभुत्व की अभिलाषा ज़्यादा यथार्थवादी है। परन्तु इसकी परिणीति बहुध्रुवों में हो सकती है। दुर्भाग्यवश, यह भी शान्ति और स्थायित्व के लिए अनुकूल नहीं।

बावज़ूद इसके, इस एकात्मक ध्रुव की शक्ति और प्रभुत्व अंततः दो कारणों से क्षीण हो जाएँगे। पहला, शक्ति-सन्तुलन स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। दूसरे, एक पोल के प्रभुत्व की भारी लाग़त धीरे-धीरे उस पोल को ही कमज़ोर करती जाती है। सोवियत संघ का विघटन इसी प्रभुत्व-पालन की लागत की वज़ह से हुआ था।

इस संक्रमण काल में भारतीय शासक वर्ग का उत्तरदायित्व क्या होना चाहिए ?

यह सत्ता – संक्रमण का काल हो सकता है। यह काल लम्बा खींच सकता है। हमारे राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आतंरिक एकता एवं उत्पादकता के साथ मज़बूत निर्णयों की आवश्यकता है। सत्तारूढ़ दल की दूरदृष्टि सही होनी चाहिए। ऐसा न हो कि दलीय लड़ाइयों के चक्कर में कालजनित हित नजरअंदाज हो जाएँ। हमें याद रखना होगा कि स्वतन्त्र भारत का जन्म भी अन्तर्राष्ट्रीय संक्रमण काल में ही हुआ था।

सच तो यह है कि वह संक्रमण काल खुद भी हमारी आज़ादी में एक कारक था। स्वतन्त्रता के अतिरिक्त हमने उस काल से पूरा लाभ लेने में चूक तो नहीं की, यह बहस का बड़ा मुद्दा हो सकता है। परन्तु भूतकाल को कोसने के चक्कर में कहीं भविष्य की ट्रेन न छूट जाये।

सत्ता-सन्तुलन ऐसा न बदले कि एकल प्रभुत्वशाली राष्ट्र हमारा पड़ोसी हो। प्रभुत्व कायम करने की क़ीमत तो देश को चुकानी ही होगी। या फिर एक काल तक शत्रुतापूर्ण प्रभुत्व के साये में रहने की कीमत। जय हिन्द।

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